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1 month ago

सरदार उधम सिंह द्वारा लंदन जाकर बदला लेना

3 मार्च 1940 को सरदार उधम सिंह ने जलियांवाला बाग का बदला लंदन जाकर ओ’ड्वायर को गोली मारकर लिया था। 26 दिसंबर 1899 को उधम सिंह का जन्म सुनाम में हुआ (इतिहासकारों में जन्म-तिथि और जन्म-स्थान को लेकर थोड़ा-बहुत मतभेद है)। बचपन में उधम सिंह का नाम शेर सिंह था और उनके बड़े भाई का नाम साधू सिंह था। अमृतपान करने के बाद चूहर सिंह कंबोज (पिता) का नाम टहल सिंह हो गया। वे रेलवे विभाग में उपली गाँव के पास रेलवे फाटक पर गेटमैन की नौकरी करते थे। शेर सिंह जब केवल दो वर्ष का था, तभी उसकी माता का देहांत हो गया। साधू सिंह, शेर सिंह से पाँच वर्ष बड़ा था। घर की हालत अच्छी नहीं थी। टहल सिंह ने अपने दोनों बच्चों को लेकर अमृतसर में रहने वाले अपने एक कीर्तनिया रिश्तेदार चंचल सिंह के पास जाने का फैसला किया। रास्ते में वे बीमार हो गए। संयोग से चंचल सिंह से मुलाकात हो गई। टहल सिंह को अमृतसर के सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई। दोनों बच्चे अनाथ हो गए। उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी चंचल सिंह पर आ गई। वह कीर्तनिया थे, उन्हें दूर-नेड़ भी जाना पड़ता था। बच्चों की देखभाल कैसे हो? यह सोचकर चंचल सिंह ने दोनों बच्चों को अमृतसर के केंद्रीय खालसा यतीमखाने में दाखिल करा दिया। यतीमखाने की परंपरा थी कि यहाँ हर बच्चे को अमृतपान कराना जरूरी था। शेर सिंह और साधू सिंह को भी अमृतपान कराया गया। शेर सिंह का नाम उधम सिंह रखा गया और साधू सिंह का नाम मोता सिंह रखा गया (कुछ इतिहासकार साधू सिंह का नाम “मुक्ता सिंह” भी लिखते हैं)। दोनों भाई यतीमखाने में पलते रहे और वहाँ हस्तकला भी सीखते रहे। शेर सिंह (जो अब उधम सिंह बन चुका था) अक्सर काम बदलता रहता— कभी कुर्सियाँ बनाने लगता, कभी सिलाई में मन लग जाता, कभी तबला सीखने लगता, कभी कीर्तनिया बन बैठता। बचपन से ही उसमें एक जगह टिककर काम करने का स्वभाव नहीं था। यही स्वभाव उसके अंत तक साथ रहा, जब वह हर यात्रा में अपना नाम बदल लेता था। 1913 में निमोनिया (नमूनीया) की बीमारी से उसके बड़े भाई साधू सिंह (मोता सिंह) की मृत्यु हो गई। शेर सिंह के लिए बड़ा भाई पिता जैसा सहारा था। वह उदास रहने लगा, रात को रोता, आसमान के तारों में अपने माँ-बाप और भाई को ढूँढता। धीरे-धीरे वह संभला और उसने दसवीं कक्षा पास कर ली। यतीमखाने से स्कूल जाते या स्कूल से लौटते समय, या श्री हरिमंदर साहिब के दर्शन के लिए जाते हुए, वह रास्ते में अंग्रेजों को देखता— वे किसी को कोड़े मार रहे होते, किसी से उठक-बैठक लगवा रहे होते। उसका मन दुखी हो उठता। मौका मिलने पर वह जानने की कोशिश करता कि अंग्रेज सज़ा क्यों देते हैं। पता चलता कि उधर से कोई अंग्रेज अफसर घोड़े पर गुजर रहा था और अनजाने में किसी दुकानदार या राहगीर ने उसे सलाम नहीं किया, तो उसे कोड़े या उठक-बैठक की सज़ा दी जाती। अंग्रेज अफसरों के इस व्यवहार ने उधम सिंह का मन अंग्रेजों के प्रति नफरत और घृणा से भर दिया, और समय के साथ यह घृणा बढ़ती चली गई। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग की घटना से पूरे भारत में रोष की लहर फैल गई। वास्तव में, 1915 के डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट से ही इसके बीज बोए जा चुके थे और रॉलेट एक्ट ने इसे और बढ़ाया। भारतीयों को दबाने के लिए यह कानून लाया गया था— शक के आधार पर किसी को भी पकड़ लो; न मुकदमा, न सुनवाई, न फरियाद। सीधे कालेपानी या उम्रकैद की सज़ा। न कोई अपील, न कोई दलील, न कोई वकील। मज़ाहिरों और जुलूसों के डर से अंग्रेजी हुकूमत ने जनता के नेताओं डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल को अमृतसर से गिरफ्तार करके डलहौज़ी में नजरबंद कर दिया। उसी रोष में और अपने नेताओं को रिहा करवाने के लिए जलियांवाला बाग में पंजाबी— जिनमें हिंदू, सिख और मुसलमान भी शामिल थे— इकट्ठे हुए। 13 अप्रैल बैसाखी का दिन था। कुछ श्रद्धालु दरबार साहिब मत्था टेकने आए थे, वे भी सभा में शामिल हो गए। जनरल डायर ने धारा 144 लगा रखी थी और एकत्र होने पर रोक थी। एक मुखबिर की सूचना पर डायर भड़क उठा और बिना चेतावनी के निहत्थे लोगों पर गोलियों की बारिश करा दी। गैर-सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 1200 से अधिक घायल हुए। अमृतसर के सिविल सर्जन के अनुसार 1800 मौतें हुई थीं। यह भी कहा जाता है कि उधम सिंह अपने यतीमखाने के साथियों के साथ वहाँ पानी पिलाने की सेवा कर रहा था, उसने यह निर्दयता अपनी आँखों से देखी और दरबार साहिब जाकर स्नान करके बदला लेने की प्रतिज्ञा की। उधम सिंह ने करतार सिंह सराभा की जीवनी पढ़ी थी और मदन लाल ढींगरा के बारे में सुना था। जलियांवाला बाग के बाद उसके जीवन का उद्देश्य ही बदल गया। उसका प्रण 21 वर्षों बाद 13 मार्च 1940 को पूरा हुआ, जब उस दिन दोपहर तीन बजे वेस्टमिंस्टर के कैक्सटन हॉल में ईस्ट इंडियन एसोसिएशन और सेंट्रल एशियन सोसायटी की संयुक्त बैठक के दौरान उधम सिंह ने माइकल ओ’ड्वायर और उसके साथियों पर गोलियाँ चला दीं। माइकल ओ’ड्वायर मंच की सीढ़ियों पर ही गिर पड़ा और मर गया। लॉर्ड ज़ेटलैंड और लॉर्ड लैमिंगटन घायल हो गए। खबर फैलते ही पूरा लंदन मानो हिल गया। जून 1997 में इंग्लैंड सरकार द्वारा जारी की गई 5 फाइलों (771 पन्ने) से पता चलता है कि शहीद उधम सिंह ने कैक्सटन हॉल में केवल माइकल ओ’ड्वायर पर ही नहीं, बल्कि कुल चार अंग्रेज अफसरों पर छह गोलियाँ चलाईं, जिनमें माइकल ओ’ड्वायर मौके पर ही मारा गया और बाकी घायल हुए। ये सभी अफसर भारत में गवर्नर रह चुके थे और भारत की आज़ादी के विरोधी थे। लेखक: जोरावर सिंह तरसिक्का पूरे इक्कीस साल तक जलियांवाला बाग की घटना उधम सिंह के सीने में आग की तरह धधकती रही और बेगुनाह, निहत्थे पंजाबियों की चीखें उसके कानों में गूँजती रहीं। जनरल डायर तक पहुँचने के लिए वह कभी उदय सिंह, कभी शेर सिंह, कभी ऊदन सिंह, कभी उधम सिंह, कभी मोहम्मद सिंह आज़ाद, आज़ाद सिंह, बाबा, फ्रैंक ब्राज़ील जैसे नामों से प्रयास करता रहा। शायद ही कोई ऐसा क्रांतिकारी हुआ हो जिसने अपने लक्ष्य के लिए इतने नाम बदले हों। उसने सिर्फ अपने नाम ही नहीं बदले; मंज़िल पाने के लिए उसने अलग-अलग देशों और महाद्वीपों की यात्राएँ भी कीं— कभी सड़क मार्ग से, कभी समुद्र के रास्ते। जब तक मिशन पूरा नहीं हुआ, वह चैन से नहीं बैठा। वह ग़दरी बाबाओं से मिला, क्रांतिकारियों के पास जाता रहा, उनके लिए हथियारों का प्रबंध भी करता रहा। आश्चर्य की बात है कि साथियों के साथ उसका व्यवहार ऐसा था कि लोग उसे “बातें फेंकने वाला” ही समझते थे, उसकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते थे। उल्टा उसे कहते— “तू कभी भी थेम्स के पानी को आग नहीं लगा सकेगा।” 13 मार्च 1940 को उधम सिंह ने सचमुच थेम्स के पानी को आग लगा दी। इंग्लैंड में उसके दोस्त भी चकित रह गए। पूरे ब्रिटेन, भारत और दुनिया भर में इस साहसिक कारनामे की चर्चा होने लगी। माइकल ओ’ड्वायर को मारकर और उसके सहयोगियों को घायल करके उधम सिंह घटना स्थल से भागा नहीं। उस समय की तस्वीर में वह मुस्कराता हुआ दिखाई देता है और गर्व से भरा हुआ है। उधम सिंह जानता था कि उसे फाँसी होगी। वह कहता है— “मैं अपने शहीद साथियों के पास जा रहा हूँ।

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