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Nitnama Hindi Ai
1 month ago

अकाली फूला सिंह जी की शहादत

14 मार्च 1823 को महान जत्थेदार अकाली फूला सिंह जी ने नौशहरा की लड़ाई में शहादत प्राप्त की। अकाली बाबा फूला सिंह जी निहंग सिंह थे, जो शिरोमणि पंथ अकाली बुद्धा दल और श्री अकाल तख़्त के जत्थेदार रहे। 62 वर्ष के अपने जीवन का प्रत्येक दिन उन्होंने गुरु के लेखे लगाया। ऐसी आत्माएँ बहुत विरल ही संसार में आती हैं। गुरबाणी में आता है: “जनम मरण दुहहू महि नाही जन परउपकारी आए ॥” अर्थात ऐसी आत्माएँ जन्म-मरण के बंधन से ऊपर होती हैं और दूसरों का भला करने, संसार का कल्याण करने के लिए आती हैं। फूला सिंह का जन्म सन् 1761 ई. में सरदार ईश्वर सिंह और माता हरि कौर के घर हुआ। मालवा की धरती पर बांगड़ वाले इलाके की ओर जाएँ तो सुनाम और उसके आगे बुढलाढ़ा आता है। उससे आगे हरियाणा की ओर बांगड़ देश शुरू होता है, जहाँ बांगड़ू लोग रहते हैं। उसी क्षेत्र के देहलां गाँव में बाबा ईश्वर सिंह जी के घर बाबा फूला सिंह जी का जन्म हुआ। सिख परंपरा के अनुसार जब सिख घर में बच्चा जन्म लेता है तो 21वें दिन श्री आदि ग्रंथ साहिब से हुकमनामा लेकर नाम रखा जाता है। आदि ग्रंथ साहिब से हुकमनामा आया: “फिरत फिरत भेटे जन साधू पूरै गुरि समझाइआ ॥ आन सगल बिधि कांमि न आवै हरि हरि नामु धिआइआ ॥१॥” इसी से “फ” अक्षर पर उनका नाम “फूला” रखा गया। बाबा ईश्वर सिंह जी, अकाली बाबा नैणा सिंह जी और बाबा तपा सिंह जी तीन भाई थे। बाबा ईश्वर सिंह जी गृहस्थ थे, जबकि अकाली बाबा नैणा सिंह जी और अकाली बाबा तपा सिंह जी बृह्मचारी/बिहंगम थे। तीनों भाइयों ने बचपन में दमदमा साहिब (साबो की तलवंडी) में रहकर बाबा दीप सिंह जी से आदि ग्रंथ, दशम ग्रंथ और सरबलोह ग्रंथ की विद्या ली तथा शस्त्र-विद्या और घुड़सवारी भी बाबा दीप सिंह जी से सीखी। तीनों भाई आपस में बहुत प्रेम रखते थे, तीनों जंगी योद्धे और बाणी के रसिया थे। प्राचीन समय में अधिकांश सिंहों को आदि ग्रंथ, दशम ग्रंथ और सरबलोह ग्रंथ की बाणी कंठस्थ होती थी। जब अकाली बाबा फूला सिंह जी एक वर्ष के थे, तब उनके पिता बाबा ईश्वर सिंह जी निहंग सिंह “वड्डे घल्लूघारे” (फ़रवरी 1761) में शहीद हो गए। अंतिम समय में बाबा ईश्वर सिंह जी ने अपने दोनों भाइयों को अकाली फूला सिंह को सौंपते हुए कहा कि फूला सिंह को पंथ का सेवक बनाना और गुरु से जोड़ना। बाबा नैणा सिंह और बाबा तपा सिंह जी ने उन्हें पाला, गुरमत की गुट्टी दी। अकाली जी ने शस्त्र-विद्या और घुड़सवारी की शिक्षा भी उन्हीं से पाई और वीर योद्धा बन गए। उस समय शिरोमणि पंथ अकाली बुद्धा दल के जत्थेदार अकाली बाबा जस्सा सिंह जी आहलूवालिया थे। 1784 में बाबा जस्सा सिंह जी का देहांत हो गया। उनके बाद पंथ का एकत्रीकरण हुआ और नए जत्थेदार के चयन की आवश्यकता हुई— जिसके लिए योग्य धार्मिक और वीर सिंह चाहिए था। पंथ की नजर उस समय अकाली बाबा नैणा सिंह जी पर पड़ी। वे गुरमत के धनी, शस्त्र-विद्या में निपुण, तपस्वी और जपी थे। उन्होंने बाबा दीप सिंह जी की संगत की थी और गुरमत व शस्त्र-विद्या में सिद्ध थे। पंथ ने उन्हें जत्थेदार नियुक्त किया। उन्होंने जत्थेदारी बहुत अच्छे ढंग से निभाई और सिखी का प्रचार किया। वे फूला सिंह को हमेशा अपने साथ रखते थे। कम उम्र में ही अकाली फूला सिंह घुड़सवारी, निशानेबाज़ी, तेज चलाना और वीरता पूर्ण अनेक कौशलों में दक्ष हो चुके थे। उन्होंने शहीदों की मिसल के बाबा नैणा सिंह के साथ मिलकर समय की आवश्यकता अनुसार पंथ के लिए कई महान सेवाएँ कीं। बाबा नैणा सिंह के देहांत के बाद सर्वसम्मति से उन्हें मिसल का जत्थेदार बना दिया गया। सरदार नैणा सिंह की मृत्यु के बाद उन्होंने अमृतसर में (जहाँ आज अकाली फूला सिंह बुंगा है) अपना निवास बनाया। उस समय सिख मिसलों की सरकारों ने अकाली जी को अकाल तख़्त की सेवा सौंप दी और शस्त्रधारी सिंहों के निर्वाह के लिए जागीर भी प्रदान की। सन् 1802 में महाराजा रणजीत सिंह ने अमृतसर को जीतने का निर्णय किया, जो उस समय भंगी मिसल के कब्ज़े में था। यह सुनकर अकाली जी का पंथक-प्रेम से भरा हृदय दुखी हुआ। उन्होंने अपनी सूझ-बूझ से बीच में पड़कर युद्ध रुकवा दिया और सिखों को सिखों का रक्त बहाने से बचा लिया। इसके बाद महाराजा रणजीत सिंह का अकाली जी के प्रति बहुत सम्मान और स्नेह हो गया। हर कठिन अभियान में वे अकाली जी की सहायता लेते और महत्वपूर्ण मामलों में सलाह भी लेते रहे। महाराजा रणजीत सिंह ने अकाली जी के अधीन “अकाल” नाम की रेजीमेंट बनाई और उसका मुखिया उन्हें नियुक्त किया। अकाली जी का जीवन लगभग पूरा समय युद्धों में बीता। सिख राज की स्थापना और विस्तार के लिए उन्होंने अनेक युद्ध लड़े— जैसे कसूर, अटक, कश्मीर, हज़ारा, पेशावर और मुल्तान आदि। अकाली बाबा फूला सिंह जी द्वारा लड़ी गई अंतिम लड़ाई नौशहरा की सीमा-युद्ध थी। अफ़ग़ानिस्तान का बादशाह 50,000 से अधिक सेना लेकर नौशहरा के खुले मैदान में खालसा से युद्ध करने आया। खालसे की ओर से भी तैयारी हो गई। युद्ध से पहले अरदास की गई। लेकिन पीछे से तोपें न पहुँच पाने के कारण महाराजा रणजीत सिंह ने अभियान को कुछ देर के लिए टालना उचित समझते हुए सेना को दोपहर तक रुकने का आदेश दिया। जब अकाली जी को यह पता चला, तो उन्होंने कहा— “हम गुरु की हज़ूरी में अरदास कर चुके हैं, अब पीछे हटना उचित नहीं। हम तो चढ़ाई करेंगे और लड़ेंगे; जीत कलगियाँ वाले के हाथ है। अरदास करके पीछे मुड़ना खालसे का धर्म नहीं।” यह कहकर वे अकेले ही अपने 1500 घुड़सवारों के साथ नदी पार करके किले की ओर बढ़ गए। दुश्मन की टुकड़ियों को चीरते हुए उन्होंने हजारों पठानों को ढेर कर दिया। महाराजा ने उनकी इस बहादुरी को देखकर अपनी सेनाएँ भी आगे बढ़ा दीं। उन्होंने किले की दीवार तोड़कर अपने घोड़ों समेत भीतर प्रवेश किया और ऐसी वीरता से लड़े कि शत्रु के पैर उखड़ गए। विजय का झंडा लहराते हुए, सात गोलियाँ खाकर वे 14 मार्च 1823 को शहीद हो गए। महाराजा के लिए उनकी शहादत गहरे सदमे से कम नहीं थी। उनका अंतिम संस्कार वहीं सैन्य सम्मान के साथ किया गया। बाद में उनके चिता-स्थल की कुछ भूमि बेचने का प्रयास हुआ, जिस पर सिखों ने मुकदमा दायर किया। 18 जुलाई 1918 को फैसला सिखों के पक्ष में हुआ और यह भूमि शिरोमणि अकाली दल की निगरानी में सौंप दी गई। इस लड़ाई से भाग निकलने वाले पठानों में एक का नाम मुल्ला रशीद था, जो बहुत बहादुर माना जाता था। उससे पूछा गया कि अब सिंहों के साथ जिहाद कब करोगे? उसने उत्तर दिया कि सिंहों के सामने होकर लड़ने का इरादा मैंने हमेशा के लिए छोड़ दिया है। हाँ, यदि मुझे इतना लंबा भाला बना दिया जाए कि मैं सरहद की चोटियों पर खड़े होकर मझे तक के सिंहों को निशाना बना सकूँ, तो मैं अपना फैसला बदल सकता हूँ। फिर उसने अपने पैरों को चूमते हुए कहा— “इन पैरों के कारण मैं बच निकला, नहीं तो मैं भी अपने हजारों भाइयों की तरह युद्धभूमि में काट दिया जाता।” अकाली फूला सिंह जी का ऐसा भय पठानों के दिलों में था। अकाली फूला सिंह जी निडर और निर्भीक सेनापति होने के साथ-साथ सिख मर्यादा के भी पक्के पालनकर्ता थे। वे मर्यादा के विरुद्ध किसी की भी कार्रवाई सहन नहीं करते थे। महाराजा रणजीत सिंह को भी मर्यादा के विपरीत कार्य करने पर तंख़ाहिया घोषित किया गया और अकाल तख़्त के सामने बाँधकर कोड़े मारने की सज़ा सुनाई गई। महाराजा ने भी इस आदेश के आगे सिर झुकाया। महाराजा जींद जब अंग्रेजों के विरुद्ध अकाली फूला सिंह की शरण में आनंदपुर साहिब आए, तो अंग्रेजों के दबाव के बावजूद अकाली जी ने उन्हें धक्का नहीं दिया, क्योंकि यह सिखी इखलाक के विरुद्ध था। अकाली फूला सिंह जी वीर योद्धा होने के साथ-साथ धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उन्होंने अकाल की अगुवाई में गुरुद्वारों के सुधार और सिख कौम की भारी सेवा की। यात्राएँ करते रहे, पर निवास अमृतसर ही रखा। अमृतसर में “अकाली दल फूला सिंह अकाली बुंगा” और निहंगों की छावनी उनके नाम समर्पित है। वे गृहस्थ नहीं थे। लेखक: जोरावर सिंह तरसिक्का वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।

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