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Nitnama Hindi Ai
1 month ago

गुरु हरगोबिंद साहिब जी का आनंद कारज

28 मार्च 1613 ईस्वी को श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी का आनंद कारज माता नानकी जी के साथ नगर बकाला में हुआ। आइए माता नानकी जी के इतिहास पर संक्षिप्त दृष्टि डालें। माता नानकी जी (श्री गुरु तेग बहादर जी की पूजनीय माता जी) माता नानकी जी का जन्म खत्री हरी चंद के घर माता हरदई की कोख से बकाला गांव (ज़िला अमृतसर) में लगभग 1597 ई. के आसपास हुआ। पिता का कारोबार अच्छा होने के कारण आसपास उनका अच्छा प्रभाव था और वे पूर्ण सिख थे। घर में धार्मिक वातावरण होने से बालिका नानकी जी के विचार भी धार्मिक बन गए। उन्होंने वे सभी गुण अपनाए जो एक सुघड़ स्त्री में होने चाहिए। जब घर में सिख संगत पिता जी से मिलने आती, तो वह दौड़-दौड़कर उनकी हर प्रकार की सेवा करती—लंगर तैयार करना, बर्तन माँजना, पानी लाना आदि। अमृत वेले उठकर माता-पिता की तरह नाम-अभ्यास में जुट जातीं। उनका स्वभाव अत्यंत मधुर, मिलनसार और शीतल था। ऊपर से परमात्मा ने उन्हें लंबा कद, सुंदर और भरा हुआ शरीर बख्शा था। भक्ति-भाव वाले स्वभाव के कारण पिता हरी चंद ने उनका रिश्ता उस समय के ऊँचे, लंबे और सुडौल व्यक्तित्व वाले गुरु हरगोबिंद साहिब के साथ तय कर 1613 ई. में बड़े धूमधाम से विवाह कर दिया। माता नानकी जी ससुराल जाते ही अपने गुणों के कारण सास माता गंगा जी का हृदय जीत लिया। अमृत वेले उठकर स्नान करातीं, फिर गुरु जी के लिए पानी आदि लाकर देतीं और फिर नाम-अभ्यास में लग जातीं। माता दमोदरी जी से भी बहुत प्रेम करतीं और उन्हें काम न करने देतीं; हर काम स्वयं उत्साह से कर लेतीं। उनके बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी अपने ऊपर ले ली। छोटी बीबी वीरो जी से बहुत प्यार करतीं। लंगर और आने-जाने वाली संगत की देखभाल भी करतीं। रात को माता गंगा जी की “मुठ्ठी चापी” (हल्की मालिश) भी करतीं। उनकी कोख से 1619 में बाबा अटाल राय जी का जन्म हुआ, जिन्हें वे बड़े चाव से पालती थीं। गुरु जी की सुघड़ शिक्षा से वे बचपन से ही नाम-अभ्यास में लीन रहते। 1621 में 1 अप्रैल को माता नानकी जी की सफल कोख से बाबा त्याग मल (श्री गुरु तेग बहादर जी) का जन्म हुआ तो बड़ी खुशियाँ मनाई गईं। गुरु जी ने बालक को गोद में लेकर चरण-स्पर्श करवाया और वरदान दिया— “यह इंद्रियों पर विजय पाने वाला, त्याग की शिखर पर पहुँचने वाला, कुर्बानी का पुंज, दीन-दुखियों के संकट हरने वाला, ब्रह्म-ज्ञानी, तेज का धनी, वचन का पक्का और धर्म का रक्षक बनेगा।” यह वर सुनकर माता जी आनंदित हो उठीं। बालक को दादी माता गंगा जी गोद से न उतारतीं, बहुत लाड़ करतीं। बाबा अटाल जी और बहन वीरो जी भी बालक से बहुत प्रेम करते। बकाला फेरी भाई मिहराजी बकाला के निवासी और गुरु-घर के अनन्य श्रद्धालु थे। उन्होंने एक नई हवेली बनवाई, पर गुरु हरगोबिंद साहिब के चरण-पवित्र किए बिना उसमें बसना नहीं चाहते थे। वे रोज़ धूप-बत्ती कर गुरु जी को याद करते कि वे आकर चरण पावन करें। उधर अमृतसर में बैठे गुरु जी के दिल की तारे खड़क उठीं। भाई बिधी चंद, भाई जेठे, भाई पिराने आदि को साथ लेकर, माताओं को “गढ़बैलहा” में बैठाकर, सुबह वहाँ से चले और शाम को बकाला पहुँच गए। भाई मिहरा के भाग जाग उठे। गुरु जी का उतारा हवेली में करवाया गया। वे बार-बार गुरु चरणों में माथा टेककर धन्यवाद करता न थकते। अगले दिन हरी चंद के परिवार को पता चला तो वे भी दर्शन करने आए और आनंद प्राप्त किया। माता नानकी जी अपने साहिबजादों को ननिहाल लाकर फूली न समाईं। गुरु जी के बकाला आने की खबर सुनकर दोआबे और रियाड़की से संगत उमड़ पड़ी। घी, दूध, आटा, गुड़, शक्कर आदि लाकर लंगर चल पड़े। रात-दिन संगत जुड़ती, कीर्तन और ढाढ़ी वारें होतीं, अंत में गुरु जी उपदेश देते—मानो बकाला सचखंड बन गया। यहीं वृद्ध माता गंगा जी ने कुछ समय बीमार रहकर संवत 1685 की 14 तारीख़ को देह त्याग दी। गुरु जी ने स्वयं माता का “बिबान” सजाया और माता जी की वसीयत अनुसार व्यास नदी में जल-प्रवाह कर दिया। जहाँ आज राधा स्वामी सत्संग-घर बना है, वहाँ माता गंगा जी के “देहरे” नाम का सुंदर गुरुद्वारा भी स्थित है (बाबा बकाला साहिब, महित्ता रोड पर)। वहाँ हर साल फरवरी में भारी रैन-सबाई कीर्तन होता है। कुछ सप्ताह वहाँ रहकर गुरु जी फिर अमृतसर लौट आए। बाबा अटाल राय जी का अकाल चलाण माता नानकी जी की योग्य शिक्षा और नाम-अभ्यास के कारण बाबा अटाल राय जी नौ वर्ष की आयु में ही ऊँची आध्यात्मिक अवस्था तक पहुँच गए। एक दिन “मोहन” नामक लड़का खेलते समय उनकी “मीटी” (खिलौना/खिदो-खूंडी का हिस्सा) लेकर चला गया। रात को उसे साँप ने डस लिया और वह मर गया। घर में रोना-पीटना मच गया। बाबा अटाल राय जी साथियों सहित उसके घर गए और उसकी गर्दन पकड़कर बोले—“उठ, हमारी रात वाली मीटी दे, मुकरकर क्यों पड़ा है!” वह उठ खड़ा हुआ और बच्चों के साथ खेलने चल पड़ा। यह घटना पूरे नगर में चर्चित हो गई। जब गुरु जी ने यह सुना तो उन्होंने कहा—“हमारे घर में कौन रब का शरीक जन्म प गया है?” ये क्रोध भरे शब्द सुनकर बाबा जी घर से चादर लेकर कौलसर की दक्षिणी तरफ जाकर समाधि में बैठ गए और प्राण त्याग दिए। वहीं स्नान कराकर संस्कार किया गया। आज वहाँ नौ मंज़िला “बाबा अटाल” की मीनार उनकी याद ताज़ा कराती है। इस घटना का माता नानकी जी पर असर होना स्वाभाविक था, पर उन्होंने यह सदमा बड़ी बहादुरी से सहा। आँखों से आँसू तक न बहाए, बल्कि सांत्वना देने आई संगत को समझाया— “ये पुत्र-धियाँ अकाल पुरख की दी हुई माया हैं। चाहे वह वापस ले ले, हमें कोई रोस नहीं करना चाहिए। रज़ा में रहकर भाणा मानना चाहिए।” बीबी वीरो जी और छोटे वीर जी (बाबा त्याग मल) पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। बहन वीरो जी कई बार रो पड़तीं, तो माता जी उन्हें गले लगाकर धीरज देतीं। माता जी ने बीबी वीरो जी के विवाह की सारी व्यवस्था भी स्वयं सँभाली और रिश्तेदारों की सेवा-सत्कार तथा लेन-देन की ज़िम्मेदारी भी प्रसन्न मुख से निभाई। अब युद्धों से विराम पाकर गुरु जी कीरतपुर जाकर टिके। वहीं रहते हुए श्री तेग बहादर जी की शादी की तारीख़ तय कर गुरु जी करतारपुर पहुँचे। 1 मार्च 1632 को श्री तेग बहादर जी का विवाह करतारपुर निवासी लाल चंद जी की पुत्री गुजरी जी से पूर्ण गुरमर्यादा अनुसार हुआ। लाल चंद जी ने विनम्रता से कहा कि उनके पास देने योग्य कुछ नहीं। सच्चे पातशाह ने फरमाया— “लाल चंद! तुमने सब कुछ दे दिया, जब बेटी अर्पण कर दी, फिर पीछे क्या बचा रखा?” माता नानकी जी से श्री गुरु तेग बहादर जी को पूर्ण आध्यात्मिक और आदर्श गुण प्राप्त हुए, जिनसे वे महान कार्यों में सफल रहे। फिर परिवार कीरतपुर चला गया। कीरतपुर में माता नानकी जी लगभग दस वर्ष तक गुरु जी के साथ रहीं और गुरु जी की हर प्रकार से देखभाल करती रहीं। वहाँ गुरु जी ने अपने पुत्रों के स्थान पर पोते को गद्दी देकर नई परंपरा स्थापित की। माता नानकी जी ने गुरु आज्ञा को स्वीकार किया, जबकि सूरज मल की माता ने हठ किया। माता नानकी जी विशाल हृदय और दूरदर्शी थीं। उन्होंने लोभ-लालच से ऊपर उठकर श्री हरि राय जी को गद्दी पर विराजमान देखकर सम्मान किया और अपने पुत्र के लिए कोई आग्रह नहीं रखा। उनका गुरु-गद्दी के प्रति व्यवहार सदा गुरु की आज्ञा के अनुरूप रहा। नकारात्मक भाव—निराशा, क्रोध, निंदा-चुगली, किसी का बुरा सोचना—इनसे वे सदा दूर रहीं। गुरु जी ने माता नानकी जी को अंतिम वचन दिए— “तुम बकाला निवास रखो। हरिगोबिंदपुर का इलाका तेग बहादर के अधीन रहेगा। तेग बहादर की तपस्या और साधना की चर्चा संसार में होगी। जिस वस्तु (गद्दी) की चाह है, उसके पीछे दौड़ने की जरूरत नहीं। वह धुर-दरगाह की दात है; जब निरंकार का हुक्म होगा, वह स्वयं तुम्हारे घर पहुँचेगी।” साथ ही आदेश हुआ कि “तुम बकाला जाकर भाई मिहरा के घर ठहरो, एकांत में रहो और सच्ची घाल-घालो।” गुरु हरि राय जी को भी कहा गया कि चाचा तेग बहादर का मान-सत्कार पिता समान करना है। बकाला में निवास और गुरु तेग बहादर जी की साधना माता नानकी जी गुरु-पति के आदेश अनुसार अपने पुत्र तेग बहादर और बहू गुजरी जी को साथ लेकर भाई मिहरा की हवेली में ठहर गईं। भाई मिहरा ने बड़े मान से एक अलग मकान रहने के लिए दे दिया और तेग बहादर जी की तपस्या के लिए एक “भौरा” (कक्ष) बनवा दिया। तेग बहादर जी अमृत वेले स्नान कर वहाँ बैठकर महान तप करते। माता नानकी जी की छत्र-छाया में तेग बहादर जी का व्यक्तित्व और निखरा—आत्म-त्याग, ज्ञान, सहजता और निर्भयता उनके जीवन का अंग बन गए। माता जी उनके स्वास्थ्य और जरूरतों का ध्यान रखतीं। गुरु जी कई बार बाहर निकलकर प्रचार यात्राओं पर भी जाते और सिखी का प्रचार करते। संगतें जब दर्शन हेतु आतीं तो निश्चित समय अनुसार दर्शन देकर उपदेश करते—इसी कारण उस क्षेत्र में सिखी फली-फूली। जब बालक गुरु हरिकृष्ण जी दिल्ली में जोति-जोत होने लगे, तो संगत ने पूछा कि वे किसके चरणों में लगें। बंसावलीनामा में मिलता है: “बाबा बकाले।” यह संकेत था कि तेग बहादर जी बकाला में विराजमान हैं। उस समय धीर मल और अन्य 22 पाखंडी लोगों को भ्रमित करने आ गए, पर दरबारी सिख गुरु-गद्दी की वस्तुएँ लेकर माता नानकी जी के पास पहुँचे। जब गद्दी की वस्तुएँ गुरु तेग बहादर जी के आगे रखीं गईं तो उन्होंने कहा— “यह गद्दी अकाल पुरख की दात है। ढिंढोरा पीटने की जरूरत नहीं। न ही 22 दुकानदारों में अपनी चर्चा करवानी है। अकाल पुरख स्वयं सच्चाई प्रकट करेगा।” फिर अकाल पुरख ने गुरु जी को प्रकट करने हेतु भाई माखन शाह को भेजा। गुरु तेग बहादर जी प्रकट होकर अमृतसर, तरनतारन, खडूर साहिब, गोइंदवाल, करतारपुर होते हुए कीरतपुर पहुँचे। माता नानकी जी ने सलाह दी कि यहाँ सूरज मल की संतान होने से संघर्ष का भय है, इसलिए आगे चलें। वहाँ से चलकर माखोवाल गाँव में टिके और नगर बसाने की शुरुआत हुई। कुछ प्रमुख सिखों को ज़िम्मेदारी देकर गुरु जी परिवार सहित दक्षिण की प्रचार यात्रा पर निकल पड़े। संगतों को तारते हुए दिल्ली, यूपी, बिहार होते पटना पहुँचे। माता गुजरी जी गर्भवती थीं, इसलिए किप्राल चंद और कुछ सिखों को पटना छोड़कर गुरु जी बंगाल, ढाका और असम तक प्रेम-संदेश देते पहुँचे। पोह सुदी सप्तमी 1723 बि. को वहाँ बाल गोबिंद जी का प्रकाश हुआ। पटना में बालक गोबिंद राय जी की परवरिश दादी माता नानकी जी की छत्र-छाया में होती रही। बाद में गुरु जी ने संदेश भेजा और परिवार चक नानकी पहुँचा। बालक गोबिंद राय के आने पर दीपमाला हुई और अत्यंत आनंद मनाया गया। इसी खुशी में चक नानकी का नाम बदलकर “आनंदपुर” (खुशी का घर) रख दिया गया। गुरु तेग बहादर जी ने बालक गोबिंद राय जी के लिए शास्त्र-शस्त्र की शिक्षा का प्रबंध किया और यह सिद्धांत दिया—धर्म की स्वतंत्रता बचानी है, न किसी को डराओ, न किसी से डरो। माता नानकी जी ने जो गुण—निर्भयता, परोपकार, दया और दृढ़ विश्वास—अपने लाडले गुरु तेग बहादर जी में भरे थे, वे सभी गुण बालक गोबिंद राय में स्वाभाविक रूप से आ गए। दया और परोपकार की मूर्ति बनकर, नौ वर्ष की आयु में उन्होंने रोते ब्राह्मणों को देख कर धर्म की रक्षा हेतु अपने पिता का बलिदान स्वीकार कर लिया। माता नानकी जी ने वृद्धावस्था में अपने हाथों से अपने पुत्र को धर्म-रक्षा के लिए आगे किया—यह कितना महान साहस था! जब गुरु जी का शीश दिल्ली से भाई जैता जी कीरतपुर लाए और वहाँ से शोक-जुलूस आनंदपुर आया, तो माता नानकी जी और नौ वर्ष के बालक गोबिंद राय उस जुलूस की अगुवाई कर रहे थे। माता जी ने लोगों को रोने से रोककर शबद पढ़ने और भाणे में रहने का उपदेश दिया। अपने पुत्र की शहीदी के तीन वर्ष बाद वे परलोक सिधार गईं। उस समय उनकी आयु लगभग 80 वर्ष के आसपास थी। माता नानकी जी को गुरु-घर की असाधारण महिमा प्राप्त हुई—वे गुरु-पत्नी, गुरु-माता और गुरु-दादी बनने का गौरव रखती थीं। उनका जीवन सिख इतिहास की रचना, सेवा, सिमरन, भक्ति और साधना से भरपूर रहा और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा। ☬ भूल-चूक की माफ़ी ☬ दास जोरावर सिंह तरसिक्का।

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