श्री गुरु हरिराय जी सिख धर्म के सातवें गुरु थे। उनका गुरगद्दी गुरपुरब सिख इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिवस है। गुरु हरिराय जी ने वर्ष 1644 में श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी से गुरुगद्दी प्राप्त की थी। उस समय उनकी आयु केवल 14 वर्ष थी, लेकिन वे बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति और दयालु स्वभाव के थे। गुरु हरिराय जी ने अपने जीवन में शांति, दया और सेवा का संदेश दिया। उन्होंने सिखों को गुरमत के मार्ग पर चलने, नाम सिमरन करने और मानवता की सेवा करने की प्रेरणा दी। उनके समय में सिख पंथ का विस्तार हुआ और कई प्रचारकों को धर्म प्रचार के लिए तैयार किया गया। गुरु हरिराय जी को प्रकृति से बहुत प्रेम था। उन्होंने कीरतपुर साहिब में एक सुंदर बाग और औषधीय पौधों का बगीचा स्थापित किया था, जहाँ से लोगों के उपचार के लिए दवाइयाँ तैयार की जाती थीं। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने मुगल बादशाह शाहजहाँ के पुत्र दारा शिकोह का इलाज भी इन जड़ी-बूटियों से करवाया था। गुरु हरिराय जी का जीवन हमें दया, विनम्रता और सेवा की शिक्षा देता है। गुरगद्दी गुरपुरब के अवसर पर गुरुद्वारों में विशेष कीर्तन, कथा और लंगर का आयोजन किया जाता है। इस दिन श्रद्धालु गुरु साहिब के उपदेशों को याद करते हैं और उनके मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।
Please log in to comment.