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पैंदे खान गुरु हरगोबिंद साहिब जी के साथ युद्ध करने आया

26 अप्रैल को पैंदे खान जालंधर से मुग़ल सेना लेकर गुरु हरगोबिंद साहिब जी के साथ करतारपुर में युद्ध करने आया था। आइए इस इतिहास को सुनें। सभी भाइयों-बहनों से विनती है कि इतिहास अवश्य पढ़ा करें। कई लोग बिना पढ़े ही लाइक और कमेंट करते रहते हैं। यह पेज केवल संगत को इतिहास सुनाने के लिए है, न कि पैसे या प्रसिद्धि के लिए। गुरु हरगोबिंद साहिब जी का दरबार सजा हुआ था। सिख सूरमे चारों ओर खड़े थे। संगत आ रही थी, दर्शन कर रही थी और भेंट चढ़ा रही थी। गुरु साहिब ने देखा कि कुछ हथियारबंद नौजवान खड़े हैं। उन्हें बुलाया गया। उनके सरदार ने कहा — “हम पठान हैं, युद्ध करना ही हमारा काम है।” उनमें एक लंबा-तगड़ा युवक था — पैंदे खान। वह अनाथ था और अपने मामा इस्माइल खान के साथ रहता था। गुरु साहिब ने उसे अपनी सेवा में रख लिया और उसे एक शक्तिशाली योद्धा बनाने का निश्चय किया। गुरु साहिब ने उसे उत्तम आहार और कठिन अभ्यास करवाया। पैंदे खान इतना बलवान हो गया कि बड़े-बड़े घोड़ों को रोक सकता था और भारी वजन उठा सकता था। समय के साथ मुग़ल दरबार और गुरु साहिब के बीच तनाव बढ़ गया। मुग़लों को गुरु साहिब की “मीरी” (राजसत्ता) से आपत्ति थी। एक बहाना बनाकर युद्ध शुरू किया गया। लोहेगढ़ की लड़ाई में गुरु साहिब की सेना ने मुग़लों को भारी पराजय दी। इस युद्ध में पैंदे खान ने अद्भुत वीरता दिखाई। लेकिन समय के साथ पैंदे खान के मन में अहंकार आ गया। एक दिन उसे गुरु साहिब से कीमती वस्त्र, घोड़ा और बाज़ (शिकार पक्षी) मिला। रास्ते में उसके दामाद असमान खान ने लालच में वह सब ले लिया। जब गुरु साहिब ने बाज़ के बारे में पूछा, तो पैंदे खान ने झूठ बोला। बाद में सच्चाई सामने आ गई, फिर भी उसने स्वीकार नहीं किया और अपमानित होकर चला गया। इसके बाद उसने मुग़ल बादशाह से मिलकर बदला लेने की ठानी। बादशाह ने उसकी बात मान ली और बड़ी सेना के साथ करतारपुर पर हमला किया गया। तीन दिन तक भयंकर युद्ध हुआ। दोनों पक्षों को भारी नुकसान हुआ। अंत में पैंदे खान सीधे गुरु हरगोबिंद साहिब जी के सामने आ खड़ा हुआ। गुरु साहिब ने उसे पहले वार करने का मौका दिया। उसने तीन वार किए, लेकिन कोई सफल नहीं हुआ। फिर गुरु साहिब ने वार किया और उसे घायल कर दिया। अंतिम समय में पैंदे खान ने कहा — “गुरु जी, आपकी तलवार ही मेरा कलमा है, मुझे पार उतार दीजिए।” गुरु साहिब ने दया दिखाई और उसके सिर पर छाया की। कुछ ही क्षणों में उसके प्राण निकल गए। सभी बोलो — धन गुरु हरगोबिंद साहिब जी महाराज!

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