सिख इतिहास में हर दिन किसी न किसी घटना या स्मृति से जुड़ा हुआ है। गुरु साहिबानों के पर्वों के अलावा, उनके जीवनकाल से जुड़ी महत्वपूर्ण और विशेष घटनाओं को सिख समाज में बड़े प्रेम और उत्साह से याद किया जाता है। इन घटनाओं की स्मृतियों से गुजरती सिख संगतें गुरु के प्यार और आदर में समर्पित हो जाती हैं। इससे उनके जीवन-व्यवहार में सिखी का रंग और भी गहरा और स्थायी हो जाता है। इतिहास के अनुसार, चेत महीने 1664 ई. में, आठवें पातशाह श्री गुरु हरकृष्ण साहिब जी जब दिल्ली में जोति जोत समाने लगे, तो सिखों ने विनती की — “महाराज, हमें बताइए कि हमें आगे किसके साथ चलना है।” पातशाह ने पाँच पैसे और नारियल मंगवाया। बाल-प्रीतम ने थाल में रखी सामग्री के चारों ओर हाथ से तीन बार परिक्रमा की, सिर झुकाकर यह वचन कहा — “बाबा बकाले।” यह इशारा अपने बाबा गुरु तेग बहादुर जी की ओर था। सिख इतिहास में यह पहली बार हुआ कि गुरुगद्दी के अगले वारिस, जोति जोत समाने के समय, उपस्थित नहीं थे। उसी समय गुरु घर के एक सिख, भाई मख्खन शाह लुबाणा, जो एक बड़े व्यापारी थे और समुद्री जहाज़ों से व्यापार करते थे, का जहाज़ तूफान में फँस गया। उन्होंने जब कोई और उपाय न देखा, तो गुरु चरणों का सहारा लिया। अरदास की — “सच्चे पातशाह, अपने प्यारे की लाज रखें, मेरा जहाज़ पार करें। मैं आपके दर्शन के लिए आऊँगा और 500 मोहरें गुरु घर में अर्पित करूँगा।” “बिर्थी कदे न होवै जन की अरदास” के अनुसार उनका जहाज़ किनारे लग गया। जब वे गुरु दर्शन की तैयारी कर रहे थे, तब पता चला कि आठवें पातशाह जोति जोत समा गए हैं और अगले उत्तराधिकारी के लिए ‘बाबा बकाले’ का इशारा कर गए हैं। मख्खन शाह काफिले सहित बकाले पहुँचे, तो देखा कि यहाँ 22 मंजियाँ लगी हैं और कई लोग खुद को गुरु कह रहे हैं। सच्चे गुरु की पहचान करना कठिन था। घरवालों से सलाह कर उन्होंने तय किया कि गुरु तो अंतर्यामी होते हैं, जो सच्चे गुरु होंगे वे अपनी अमानत माँग लेंगे। उन्होंने सोचा कि सभी गुरुओं के आगे 5-5 मोहरें रखकर सिर झुकाएँ। लेकिन किसी ने भी पूरी अमानत नहीं माँगी। मख्खन शाह उदास हुए, फिर जानकारी मिली कि गुरु वंश में से एक और भी व्यक्ति हैं, जिन्हें लोग ‘तेगा तेगा’ कहते हैं, जो दुनियादारी से अलग होकर भक्ति में लीन रहते हैं। वे वहाँ पहुँचे और 5 मोहरें रखकर प्रणाम कर लौटने लगे, तभी सच्चे पातशाह बोले — “वाह मख्खन शाह! जब जहाज़ फँसा था तब 500, और अब केवल 5 से काम चला दिया।” यह सुन मख्खन शाह भाव-विभोर हो गए, मोहरों की थैली आगे रखकर दंडवत किया। गुरु ने कहा — “अब शोर मत करो, नहीं तो मुँह काला कर देंगे।” ज्ञान सिंह जी लिखते हैं कि मख्खन शाह ने स्वयं ही भाई लद्धे की तरह मुँह काला किया, छत पर चढ़कर उद्घोष किया — “सच्चा गुरु लाधो रे, सच्चा गुरु लाधो रे।” उन्होंने संगत से कहा — “दर-दर मत भटको, सच्चा गुरु यही है।” फिर बाबा बुढ़ा जी के वंश से भाई गुरदित्ताजी ने गुरुगद्दी का तिलक लगाया। दिल्ली से लाई सारी सामग्री भेंट की गई। सभी ने नतमस्तक होकर दर्शन किए और भेंट अर्पित की। गुरु सूरज के प्रकट होते ही 22 मंजियाँ तारे की तरह लुप्त हो गईं। धन्य गुरु तेग बहादुर जी गुरुगद्दी पर विराजमान हुए। इतिहास के अनुसार 11 अगस्त 1664 ई. को सावन की पूर्णिमा के दिन गुरु जी प्रकट हुए। उस दिन स्वाभाविक रूप से रक्षाबंधन का दिन था। इसलिए इस दिन को सिख संगत हर साल ‘सच्चा गुरु लाधो रे’ मेले के रूप में मनाती है। ध्यान रहे कि रक्षाबंधन सनातन हिंदू धर्म का त्योहार है, और इस दिन का उससे कोई संबंध नहीं है।
Please log in to comment.