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19 hours ago

अमृत ​​वेले का हुक्मनामा - 05 अप्रैल 2026

अंग: 680
धनासरी महला ५ ॥ जतन करै मानुख डहकावै ओहु अंतरजामी जानै ॥ पाप करे करि मूकरि पावै भेख करै निरबानै ॥१॥ जानत दूरि तुमहि प्रभ नेरि ॥ उत ताकै उत ते उत पेखै आवै लोभी फेरि ॥ रहाउ ॥ जब लगु तुटै नाही मन भरमा तब लगु मुकतु न कोई ॥ कहु नानक दइआल सुआमी संतु भगतु जनु सोई ॥२॥५॥३६॥
अर्थ: हे भाई! (लालची मनुख) अनको जातां करता है, लोगो को धोखा देता है, झूठे धार्मिक पहरावे बनाई रखता है, पाप करके (फिर उनसे मुकर जाता है) परन्तु सब के दिलों की जानने वाला प्रभु (सब कुछ) जनता है।१। हे प्रभु! तुम(सब जीवों के) नजदीक बसते हो, परन्तु (लालची पाखंडी मनुख) तुझे दूर (बस्ता) समझता है। लालची मनुख (लालच के चक्कर ) में फसा रहता है, (माया की खातिर) इधर उधर देखता है, उधर से उधर देखता है (उसका मन टिकता नहीं) ।रहाउ। हे भाई! जब तक मनुष्य के मन की (माया वाली) भटकना दूर नहीं होती, इस (लालच के पँजे से) आजाद नहीं हो सकता। हे नानक! कह– (पहरावों से भगत नहीं बन जाते) जिस मनुष्य पर मालिक-प्रभू खुद दयावान होता है (और, उसको नाम की दाति देता है) वही मनुष्य संत है भगत है।2।5।36।

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