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7 months ago

अमृत ​​वेले का हुक्मनामा - 11 अगस्त 2025

अंग: 560
वडहंसु महला ३ ॥ रसना हरि सादि लगी सहजि सुभाइ ॥ मनु त्रिपतिआ हरि नामु धिआइ ॥१॥ सदा सुखु साचै सबदि वीचारी ॥ आपणे सतगुर विटहु सदा बलिहारी ॥१॥ रहाउ ॥ अखी संतोखीआ एक लिव लाइ ॥ मनु संतोखिआ दूजा भाउ गवाइ ॥२॥ देह सरीरि सुखु होवै सबदि हरि नाइ ॥ नामु परमलु हिरदै रहिआ समाइ ॥३॥ नानक मसतकि जिसु वडभागु ॥ गुर की बाणी सहज बैरागु ॥४॥७॥
अर्थ: जिस मनुष्य की जिव्हा परमात्मा के नाम के स्वाद में लगती है, वह मनुष्य आतमिक अडोलता में टिक जाता है, प्रभु-प्रेम में जुड़ जाता है। परमात्मा के नाम सिमर कर उस का मन (माया के तृष्णा की तरफ से) भर जाता है ॥१॥ जिस के सदा-थिर प्रभु की सिफत सलाह वाले शब्द में जुड़ने से विचारवान हो जाते हैं, और सदा आतमिक आनंद मिला रहता है, मैं अपने उस गुरु से सदा कुर्बान जाता हूँ ॥१॥ रहाउ ॥ (हे भाई! गुरु की सरन की बरकत से) एक परमात्मा में सुरत जोड़ के मनुष्य की आँखें (पराये रूप की तरफ) से भर जाती हैं, और माया के प्यार दूर कर के मनुष्य का मन (तृष्णा की तरफ से) भर जाता है ॥२॥ शब्द की बरकत से परमात्मा के नाम में जुड़े शरीर में आनन्द पैदा होता है, और आतमिक जीवन की सुगंधी देन वाला हरी-नाम मनुष्य के हिरदे में सदा टिका रहता है ॥३॥ नानक जी! जिस मनुष्य के माथे पर उच्ची किसमत जागती है, वह मनुष्य गुरू की बाणी में जुड़ता है जिस से उस के अंदर आतमिक अडोलता पैदा करन वाला वैराग उपजता है ॥४॥७॥

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