साहिबज़ादा फ़ारसी शब्द है जिसका अर्थ है बादशाह का पुत्र। गुरु गोबिंद सिंह जी बादशाहों के बादशाह हैं, इसलिए उनके पुत्रों को भी साहिबज़ादा कहा जाता है। बाबा फतेह सिंह जी का जन्म गुरु गोबिंद सिंह जी के घर माता जीत कौर जी की पवित्र कुंख से 14 दिसंबर, 29 माघिर 1699 (कुछ विद्वानों के अनुसार 1698) को श्री आनंदपुर साहिब में हुआ। बाबा फतेह सिंह जी गुरु गोबिंद सिंह जी के सबसे छोटे साहिबज़ादे थे। वे भी अपने बड़े साहिबज़ादों की तरह बहुत आज्ञाकारी थे, और सभी उनको बहुत प्यार करते थे। निहंग सिंहों के मुखिया भी बाबा फतेह सिंह जी ही थे। हुआ यूँ कि बड़े साहिबज़ादे सिंहों के साथ टोलियाँ बनाकर युद्ध की खेल खेल रहे थे। बाबा फतेह सिंह जी भी खेलना चाहते थे, पर बड़े साहिबज़ादों और सिंहों ने कहा कि आप अभी छोटे हैं, आप नहीं खेल सकते। यह सब गुरु गोबिंद सिंह जी देख रहे थे। थोड़ी देर बाद बाबा फतेह सिंह जी अंदर गए और बड़ी दास्तार बाँधकर आए और बोले — “देखो अब मैं बड़ा हो गया हूँ, अब मैं भी इस खेल में हिस्सा ले सकता हूँ।” यह देखकर गुरु गोबिंद सिंह जी बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें एक अलग फौज दी, जिसे “गुरु की लाड़ली फौज” का खिताब मिला। समय बीतता गया, और आनंदपुर साहिब में बाबा फतेह सिंह जी के प्रेम और वीरता के अनेक चमत्कार देखने को मिलते रहे। फिर वह दिन भी आया जब गुरु गोबिंद सिंह जी को आनंदपुर साहिब छोड़ना पड़ा। सन 1704 की रात दसवें गुरु ने आनंदपुर का किला खाली किया। हाकिमों ने गाय-कुरान की सब खाई हुई क़समें भूलकर विश्वासघात किया और पीछे से भयंकर हमला किया। उस समय सरसा नदी में बाढ़ आई हुई थी। सरसा नदी के किनारे युद्ध हुआ। गुरु जी ने सिखों को ज़रूरत के अनुसार जत्थों में बाँटा। बड़े साहिबज़ादे अजीत सिंह जी और भाई ऊदई सिंह जी ने युद्ध की कमान संभाली। भारी युद्ध में दोनों ओर बड़ा नुकसान हुआ और गुरु परिवार तथा सिख अलग-अलग दिशा में बिखर गए। उस स्मृति में वहाँ गुरुद्वारा “परिवार विचोड़ा” स्थापित है। पातशाह से बिछड़कर माता सुंदर कौर जी, माता साहिब कौर जी और भाई मनि सिंह जी दिल्ली की ओर चले गए। माता गुजर कौर जी छोटे साहिबज़ादों के साथ चलते-चलते सरसा के किनारे मोरिंडा पहुँचे। वहाँ उनका रसोइया गंगू ब्राह्मण उन्हें अपने गाँव खेड़ी ले गया। लेकिन उसने विश्वासघात किया — पहले माता जी की मोहरों की थैली चुराई, फिर इनाम की लालच में सूबा सरहिंद को सूचना दे दी। सुबह होते ही माता गुजर कौर जी और दोनों छोटे साहिबज़ादों को गिरफ्तार कर वज़ीर की कचहरी में पेश किया गया। उन्हें रात भर ठंडे बुर्ज में भूखा-प्यासा बंद रखा गया। भाई मोती राम ने अपने परिवार की परवाह न करते हुए उनके लिए दूध पहुँचाया। तीन दिन लगातार साहिबज़ादों को कचहरी में पेश कर इस्लाम स्वीकारने के लिए डर-धमकियाँ और लालच दिए गए, पर वे अडिग रहे। मलैरकोटला के नवाब शेर मुहम्मद खाँ को भी बच्चों की मासूमियत पर दया आई और उसने काज़ी से भी कहा कि इस्लाम बच्चों पर ऐसा अत्याचार नहीं सिखाता। लेकिन दीवान सुच्चा नंद ब्राह्मण ने कहा — “साँपों के बच्चे साँप ही होते हैं” — और कठोर सज़ा की माँग की। अन्त में फ़तवा सुनाकर वज़ीर के आदेश से दोनों साहिबज़ादों को जीवित दीवार में चिनवा दिया गया। दीवार गिरने पर उनके सिरों को तलवार से धड़ों से अलग कर दिया गया। उस अत्याचारी फ़ैसले पर नवाब मलैरकोटला शेर मुहम्मद खाँ ने उठकर विरोध में “हाँ” का नारा लगाया। शहादत के बाद बच्चों के दाह-संस्कार के लिए दो गज़ ज़मीन भी देने से मना कर दिया गया, तब धनाढ्य सेठ टोडर मल ने सोने की मोहरों से ज़मीन खरीदकर अंतिम संस्कार कराया। जहाँ साहिबज़ादों का संस्कार हुआ, वहाँ आज “गुरुद्वारा जोती सरूप” स्थित है। इसके बाद अत्याचारियों ने माता गुजर कौर जी को भी ठंडे बुर्ज से धक्का देकर शहीद कर दिया। इसी कारण दिसंबर का महीना सिख संगत बाणी पढ़ते हुए, गुरु परिवार की शहादत को स्मरण करते हुए मनाती है।
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