लाहौर के सूबेदार ज़करिया ख़ान ने सिखों पर बहुत अत्याचार किए। इसके कारण सिंहों को जंगलों और पहाड़ों में रहना पड़ता था। श्री अमृतसर साहिब में बैसाखी और दीवाली जैसे पर्वों को मनाए बहुत समय हो गया था। भाई मनी सिंह जी ने कुछ सिंहों से विचार कर ज़करिया खान से बातचीत की कि यदि हमें इस वर्ष दीवाली का मेला लगाने की अनुमति दी जाए, तो हम सरकार को उसका टैक्स देने को तैयार हैं। पहले तो ज़करिया खान नहीं माना, लेकिन जब गुरु घर के विरोधियों ने उसे समझाया कि हम सिखों को ढूंढ-ढूंढकर मारते रहते हैं, अगर उन्हें अनुमति दे दी जाए, तो वे सभी वीर सिख एकत्रित होंगे और हम एक ही वार में सबका सफाया कर सकते हैं। यह सिखों को समाप्त करने का सबसे अच्छा मौका होगा। पापी ज़करिया ने मन में कपट रखकर हाँ कर दी। दिखावे के लिए उसने 5000 रुपए टैक्स लेने की शर्त रखी। भाई मनी सिंह जी ने सभी जगह पत्र लिखकर भेजे कि सभी बंदी छोड़ दिवस (दीवाली) पर श्री अमृतसर साहिब पहुँचें। सिखों में बड़ा उत्साह था और भाई साहिब ने सारी तैयारी शुरू कर दी। दूसरी ओर, ज़करिया खान ने पहले से ही बहुत बड़ी फौज अमृतसर के आसपास भेज दी। जब दीवाली नज़दीक आई तो किसी ने भाई मनी सिंह जी को बताया कि ज़करिया के मन में कपट है, वह आपकी हत्या की योजना बना रहा है। उसने फौज भी भेज दी है। दीवाली का कार्यक्रम रद्द किया जाए ताकि खालसे को नुकसान न हो। भाई साहिब को आनंदपुर साहिब की घटना याद आ गई — जब दसवें पातशाह से किए वादे तोड़े गए थे, जिससे सरसा, सरहिंद और चमकौर की त्रासदी हुई थी। भाई साहिब जी ने तुरंत खालसे को पत्र लिखे कि हाकिम के मन में कपट है, इसलिए जो जहाँ है वहीं से नमन करके वापस लौट जाए। सारा खालसा लौट गया और दीवाली पर बहुत कम लोग पहुँचे। ज़करिया खान की योजना असफल हो गई और वह क्रोधित हो गया। अब उसने यह बहाना बनाया कि मेला नहीं लगा, फिर भी टैक्स दिया जाए। भाई मनी सिंह जी ने कहा, “आपकी नीयत खराब थी, आपने मेला ही नहीं लगने दिया। जब मेला नहीं हुआ तो टैक्स किस बात का?” टैक्स न देने के कारण भाई मनी सिंह जी और साथ के सिंहों को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें लाहौर ले जाकर तरह-तरह की यातनाएं दी गईं। काज़ियों ने कहा, "भाई मनी सिंह का सिखों में बहुत आदर है, अगर हम इसे इस्लाम में ले आएँ तो बहुत से सिख भी इस्लाम में आ जाएँगे।" उन्हें पैसे देने या इस्लाम कबूलने की दो शर्तें दी गईं। भाई साहिब ने दोनों से इनकार कर दिया। तब फतवा जारी हुआ कि मनी सिंह के शरीर को अंग-अंग काट दिया जाए। 25 हाੜ 1734 (1734 ईस्वी) को आज के दिन लाहौर के नखास चौक में भाई साहिब का अंग-अंग काट कर शहीद कर दिया गया। साथ गिरफ्तार सिंहों में से किसी की पीठ की खाल उतार दी गई, किसी की आंखें निकालकर उसे चर्खी पर चढ़ा दिया गया। बाकियों को भी ऐसी ही यातनाएं देकर शहीद किया गया। भाई मनी सिंह जी की आयु 90 वर्ष थी। उन्होंने कालगीधर पिता से अमृत छका, दमदमा साहिब वाला स्वरूप तैयार करवाया, दशम ग्रंथ लिखा, और अनेक ग्रंथों की रचना की। जब तत्त्व खालसा और बंदई खालसा का विवाद हुआ, तब भाई साहिब ने ही उसका समाधान किया। भाई साहिब के परिवार के 52 सदस्य कौम के लिए शहीद हुए। (सभी के नाम बाद में लिखे जाएँगे, पोस्ट लंबी हो जाएगी) नोट: कुछ लेखकों ने टैक्स की राशि 10,000 भी लिखी है और यह भी कहा है कि दिवाली के बाद बैसाखी पर भी यही योजना बनाई गई थी। 🖊️ लेखक: मेजर सिंह गुरु कृपा करें।
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