सतगुर की सेवा गाखड़ी सिर दीजै आपु गवाइ ॥अर्थ: सतगुरु के हुक्म में चलना बहुत कठिन कार्य है; सिर देना पड़ता है और अपना अहंकार मिटाकर ही सच्ची सेवा होती है।स्रोत: श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी – अंग 27
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अंग: 696<br><span style="color:#a77d0f"><strong>जैतसरी महला ४ घरु १ चउपदे ੴसतिगुर प्रसादि ॥ मेरै हीअरै रतनु नामु हरि बसिआ गुरि हाथु धरिओ मेरै माथा ॥ ज...
ਅੰਗ: 746<br><span style="color:#a77d0f"><strong>ਸੂਹੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥ ਤਉ ਮੈ ਆਇਆ ਸਰਨੀ ਆਇਆ ॥ ਭਰੋਸੈ ਆਇਆ ਕਿਰਪਾ ਆਇਆ ॥ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਖਹੁ ਸੁਆਮੀ ਮਾਰਗੁ ਗੁਰਹਿ ਪਠਾਇਆ ॥੧...
अंग: 604<br><span style="color:#a77d0f"><strong>सोरठि महला ४ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ आपे आपि वरतदा पिआरा आपे आपि अपाहु ॥ वणजारा जगु आपि है पिआरा आपे...
अनंदपुर साहिब का दरबार सजा हुआ था। कलगीधर पिता महाराज सुशोभित विराजमान थे। शरीरिक उम्र लगभग 11 साल के आसपास थी। लाहौर से बहुत सारी संगत दर्शन के लिए आ...
अंग: 717<br><span style="color:#a77d0f"><strong>टोडी महला ५ ॥ साधसंगि हरि हरि नामु चितारा ॥ सहजि अनंदु होवै दिनु राती अंकुरु भलो हमारा ॥ रहाउ ॥ गुरु प...
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