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2 months ago

शहीद भाई साहिब भाई महाराज सिंह जी नौरंगाबाद का जन्म दिवस

13 जनवरी — शहीद भाई साहिब भाई महाराज सिंह जी नौरंगाबाद का जन्म दिवस आइए, आज उनके जीवन पर एक नज़र डालते हैं। सिख क़ौम को देश की आज़ादी की लड़ाई में 85% कुर्बानियाँ देने का गौरव प्राप्त है, जबकि देश में सिखों की जनसंख्या केवल लगभग 2% है। मुगलों को भारत से बाहर निकालने के लिए गुरु साहिबान और असंख्य सिंहों ने पंजाब और देश की रक्षा हेतु अपने सिर क़ुर्बान किए। इसी तरह अंग्रेज़ों के विरुद्ध पहली लड़ाई शुरू करने का सम्मान शहीद भाई महाराज सिंह नौरंगाबाद वालों को जाता है। वे अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ पहली क्रांतिकारी लहर के प्रमुख नेता थे, विशेषकर एंग्लो-सिख युद्ध के बाद। जन्म, बाल जीवन और आध्यात्मिक प्रवृत्ति उनका जन्म 13 जनवरी 1780, लोहड़ी के दिन, संयुक्त पंजाब के गाँव रब्बों नीची जिला लुधियाना में हुआ। उनका नाम निहाल सिंह रखा गया। बचपन निरमले संतों के डेरे में बीता, जिससे उनका स्वभाव बाल्यकाल से ही आध्यात्मिक और संत-सुभाव का था। जब वे बड़े हुए और उन्हें नौरंगाबाद के बाबा बीर सिंह की महिमा का ज्ञान हुआ, तो वे भी उनके डेरे में आकर लंगर-खाने में सेवा करने लगे। संगत को प्रेम और नम्रता के साथ सेवा करते हुए—“लो महाराज जी, लो महाराज जी”—कहते-कहते उनका नाम महाराज़ सिंह प्रसिद्ध हो गया। नेतृत्व की शुरुआत बाबा बीर सिंह जी की शहादत के बाद संगत ने उन्हें नौरंगाबाद के डेरे का महंत नियुक्त किया। सिखों पर संकट आया तो उन्होंने यह गद्दी अपने मुरीद भाई वीर सिंह को देकर अमृतसर का रुख किया। उन्होंने संਧू का तालाब अपने मुख्यालय के रूप में स्थापित किया और पंजाब व सिखों को बचाने हेतु व्यापक अभियान शुरू किया। उन्होंने गाँव-गाँव दौरे किए, हिन्दू, मुसलमान, सिख — सभी धर्मों के वे लोग जो अंग्रेज़ों के शासन के विरुद्ध थे, उन्हें संगठित किया। सिख राज बचाने का अंतिम संघर्ष उम्र अधिक थी, सिख राज समाप्त हो चुका था। उन्होंने उसे बचाने की भरसक कोशिश की, परंतु गद्दारों की धोखाधड़ी के कारण सफलता नहीं मिल सकी। उन्होंने रामनगर और चेलियाँवाला की लड़ाइयों में सिख फौज की हर संभव सहायता की। उनके साथ कई बड़े नाम भी शामिल थे — विक्रम सिंह बेदी, शेर सिंह, रछपाल सिंह आदि। महाराजा दलीप सिंह को बचाने की योजना — प्रेमा प्लॉट एक वर्ष से महाराजा दलीप सिंह लाहौर क़िले में नज़रबंद थे। भाई महाराज सिंह ने उन्हें क़िले से निकालकर सुरक्षित स्थान पर ले जाने की योजना बनाई, जो आगे चलकर अंग्रेज़ रेज़िडेंट हैनरी लॉरेंस और उससे जुड़े गद्दार दरबारियों को समाप्त करने की योजना से भी जुड़ी हुई थी। महारानी जिंद कौर, जो अंग्रेज़ों की कैद में थीं, इस योजना से अत्यंत प्रसन्न और आशान्वित थीं। महाराजा से मिलकर खोया हुआ राज-पाट वापस पाने की इच्छा लिए वह स्वयं भाई महाराज जी तक पहुँचीं। योजना का बिखरना भाई महाराज जी 400 हथियारबंद सैनिकों के साथ मुल राज से मिलने गए। झंग पहुँचने पर विशाल संगत ने उनका स्वागत किया। किन्तु मुल राज से मुलाकात के बाद उन्हें स्पष्ट हो गया कि मुल राज केवल अपने मलतान के हित के बारे में सोच रहा है—पंजाब उसके लिए गौण है। जबकि भाई महाराज जी का लक्ष्य सम्पूर्ण पंजाब की रक्षा और सिख राज की पुनर्स्थापना था। इसलिए वे चुपचाप उससे अलग हो गए। क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत जब अंग्रेज़ों को पता चला कि प्रेमा प्लॉट का मुख्य नेता भाई महाराज सिंह है, तो उन्हें पेश होने के लिए कहा गया। उन्होंने इनकार कर दिया। अंग्रेज़ों ने उन पर नौरंगाबाद से बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी और उनकी संपत्ति ज़ब्त कर ली। यहीं से उनका पूर्ण क्रांतिकारी अध्याय शुरू होता है। उन्होंने روپोश होकर बाग़ी सवारों और विद्रोहियों का साथ देना शुरू किया। सिख सेना का आत्मसमर्पण रोकने का प्रयास 1849 में जब सिख फौज गुजरात में आत्मसमर्पण की तैयारी कर रही थी, भाई महाराज सिंह वहाँ पहुँचकर इसका विरोध करने लगे। उन्हें लगता था कि एक और लड़ाई करनी चाहिए। लेकिन गद्दारों के प्रभाव में आकर फौज को हथियार डालने पड़े। उस समय उन्होंने कहा: “आज रणजीत सिंह मर गया।” क्योंकि उस दिन सिख राष्ट्र की आत्मा घायल हुई थी। अकेले क्रांतिकारी संघर्ष और गुप्त अड्डा सिख राज समाप्त होने के बाद वे अकेले ही अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखने लगे। उन्होंने जम्मू के पास देओ बटाला के जसौवाल गाँव में गुप्त ठिकाना बना लिया। उन्होंने 3 जनवरी 1850 को अंग्रेज़ों के विरुद्ध बड़े विद्रोह का दिन तय किया— जालंधर और होशियारपुर की छावनियों से विद्रोह शुरू होना था। तैयारी पूरी थी— फौज भी जुट गई थी, हथियार और धन अंग्रेज़ी खज़ानों को लूटकर जुटाना था। गिरफ्तारी और निर्वासन लेकिन विद्रोह से 6 दिन पहले, 28 दिसंबर 1849 को, एक जासूस की सूचना पर उन्हें आदमपुर झिड़ी से गिरफ्तार किया गया। जालंधर जेल में उन्हें देखने के लिए हर रोज़ विशाल संगत दीवारों को माथा टेककर लौट जाती थी। अंग्रेज़ों को डर था कि कोई बड़ा विद्रोह भड़क न जाए, इसलिए कुछ समय बाद उन्हें कोलकाता के विलियम फोर्ट ले जाया गया और फिर सिंगापुर भेज दिया गया। उन्हें ऐसे काल-कोठरी में रखा गया जहाँ खिड़कियाँ ईंट से बंद थीं, न रोशनी, न हवा। छह वर्षों तक उन्होंने नाम-सिमरन के बल पर अकथ कठिनाइयाँ झेलीं। उनकी आँखों की रोशनी चली गई, कैंसर जैसे रोग ने घेर लिया। फिर भी उन्होंने अंग्रेज़ों के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया। अंततः 5 जुलाई 1856 को सिंगापुर जेल में ही शहीद हो गए। अंग्रेज़ इतिहासकार R. Arnold लिखता है: “अगर 28 दिसंबर को भाई महाराज सिंह न पकड़े जाते, तो पंजाब हमारे हाथ से निकल जाता।” सिंगापुर की यादगार सिंगापुर में जहाँ वे शहीद हुए, वहीं सिगल्ट रोड पर उनके नाम का गुरुद्वारा और स्मारक बना हुआ है। यह स्थान केवल पंजाबी ही नहीं, बल्कि चीनी, तमिल, श्रीलंकाई, मद्रासी और मलेशियाई श्रद्धालुओं द्वारा भी सम्मान से नमन किया जाता है। पंजाब में यादगार उनके पैतृक गाँव रब्बो में गुरुद्वारा श्री दमदमा साहिब और उनके अंतिम साथी बाबा खड़क सिंह की यादगारी भी बनी हुई है। यहाँ हर साल 13 जनवरी—जन्म दिवस और 5 जुलाई—शहीदी दिवस मनाया जाता है। वਾਹਿਗुरु जी का खालसा, वਾਹिगुरु जी की फतेह।

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