गुरुद्वारा श्री ननकाना साहिब, जो गुरु नानक देव जी का जन्म स्थान है, का प्रबंध सन् 1920 में महंत नारायण दास के हाथों में था। वह पूरी महंत परंपरा में सबसे बड़ा शराबी और अत्यंत दुराचारी व्यक्ति था। उसने पवित्र गुरुधाम को अय्याशी का अड्डा बना दिया था। सन् 1917 ई. में उसने गुरुद्वारे की सीमा के भीतर एक वेश्या का नृत्य करवाया। गुरुद्वारे की परिधि में खुलेआम शराब पी जाती थी और उसके चेले अत्यंत विकृत आचरण वाले थे। सन् 1918 में एक सेवानिवृत्त सिंधी अधिकारी अपने परिवार सहित श्री ननकाना साहिब के दर्शन हेतु आया। रात के समय उसकी 13 वर्ष की बेटी के साथ महंत के एक चेले ने बलात्कार किया। उसी वर्ष पूर्णिमा के दिन जिला लायलपुर के जड़ां वाले क्षेत्र से आई छह स्त्रियों के साथ भी महंत के चेलों ने यही घिनौना कृत्य किया। जब कुछ सिखों ने महंत के सामने इसका विरोध किया तो उसने उत्तर दिया— “गुरुद्वारा हमारी निजी दुकान है, यहाँ अपनी स्त्रियों को मत भेजा करो।” महंत की बढ़ती गुंडागर्दी को देखते हुए 26 जनवरी 1921 को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के जनरल अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि 4, 5 और 6 मार्च 1921 को श्री ननकाना साहिब में सिख पंथ का विशाल सम्मेलन किया जाए, जिसमें गुरुद्वारों के प्रबंध संबंधी प्रस्तावों पर विचार किया जाएगा। विशेष रूप से श्री ननकाना साहिब के महंत को सुधार हेतु कहा जाना था। दूसरी ओर जब महंत नारायण दास को इस निर्णय की भनक लगी तो उसने लाहौर में 19, 20 और 21 फरवरी को बाबा करतार सिंह बेदी की अध्यक्षता में एक सनातन सिख सम्मेलन बुलाया, जिसमें अनेक गुरुद्वारों के महंतों को आमंत्रित किया गया ताकि अकाली सुधारकों का डटकर मुकाबला करने की योजना बनाई जा सके। महंत साजिशों में निपुण था। एक ओर वह कह रहा था कि वह शिरोमणि कमेटी की हर शर्त मानने को तैयार है, और दूसरी ओर उसने क्षेत्र के कुख्यात गुंडों—रांझा और रीहाना—को इकट्ठा कर यह षड्यंत्र रचा कि 4, 5 और 6 मार्च को आए पंथक नेताओं को मार दिया जाए। उसने पठानों को भी नौकरी पर रखा और टकुए, छुरियाँ, गंडासे, बंदूकें, पिस्तौलें, भारी मात्रा में गोलियां, मिट्टी का तेल और लकड़ियाँ जमा कर लीं। महंत की इस घिनौनी साजिश की जानकारी भाई वरियाम सिंह के माध्यम से भाई करतार सिंह झब्बर को मिली। उन्होंने भाई लछमन सिंह धारोवाली, भाई बूटा सिंह लायलपुरी आदि से सलाह की कि मार्च सम्मेलन से पहले ही गुरुद्वारे पर कब्ज़ा कर लिया जाए, जब महंत लाहौर गया हो। 17 फरवरी 1921 17 फरवरी 1921 को गुरुद्वारा सच्चा सौदा चूहरकाना में बैठक कर निर्णय हुआ कि 19 फरवरी की शाम को सिख जत्थे ननकाना साहिब की ओर कूच करेंगे। 20 फरवरी भाई लछमन सिंह लगभग 150 सिखों का जत्था लेकर चले और भाई करतार सिंह झब्बर ने 2200 सिखों का जत्था तैयार किया। उसी दिन लाहौर में पंथक नेताओं की बैठक हुई, जिसमें निर्णय हुआ कि पहले से तय कार्यक्रम से पहले कोई जत्था न भेजा जाए। संदेश भेजकर जत्थों को रोकने का प्रयास किया गया, परंतु भाई लछमन सिंह ने कहा— “अरदास करके पीछे हटना गीदड़ों का काम है, शेरों का नहीं।” 21 फरवरी 21 फरवरी की सुबह 6 बजे भाई लछमन सिंह का जत्था शबद गाता हुआ गुरुद्वारे में प्रवेश कर गया। गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष आसा की वार का कीर्तन आरंभ हुआ। थोड़ी देर बाद महंत अपने शराबी गुंडों के साथ आया और दरवाज़े बंद कर गोलियों की बौछार कर दी। शांत सिख शहीद होते रहे। बाद में तेज़ हथियारों से हमला किया गया। भाई लछमन सिंह को उल्टा लटकाकर आग में जला दिया गया। भाई दिलीप सिंह ने विरोध किया तो उन्हें जलती भट्ठी में डालकर शहीद कर दिया गया। इसके बाद लाशों को लकड़ियों पर डालकर जला दिया गया। परिणाम घटना की खबर पूरे पंजाब में फैल गई। अंततः अंग्रेज़ सरकार को झुकना पड़ा और गुरुद्वारे का प्रबंध सिख पंथ को सौंपना पड़ा। सज़ाएँ 12 अक्टूबर 1921 को महंत और उसके साथियों को फांसी व कालेपानी की सजाएँ दी गईं, जिन्हें बाद में हाईकोर्ट ने कम कर दिया। इस प्रकार शहादतों के बल पर गुरुद्वारा श्री ननकाना साहिब सिख पंथ को प्राप्त हुआ। 1947 के विभाजन के बाद यह पाकिस्तान में चला गया। आज भी सिख अरदास में इन शहीदों को स्मरण करते हैं— “गुरुद्वारों की सेवा के लिए बलिदान दिए, धर्म नहीं छोड़ा… बोलो जी वाहेगुरु।” — जोरावर सिंह तरसिक्का
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