7 मार्च 1703 को साहिबज़ादा बाबा अजीत सिंह जी और बाबा उदय सिंह जी ने गुरु गोबिंद सिंह जी के आदेशानुसार मुगलों से एक हिंदू लड़की को छुड़वाकर सम्मानपूर्वक उसके परिवार के पास पहुँचाया। लेखक: जोरावर सिंह तरसिक्का एक बार श्री आनंदपुर साहिब में दीवान सजा हुआ था कि एक ब्राह्मण, जिसका नाम देवदास (या देवीदास) था, रोता-बिलखता दीवान में पहुँचा। वह होशियारपुर के पास स्थित गाँव जोजे का निवासी था। गुरु जी ने ब्राह्मण को शांत किया और उसके रोने का कारण पूछा। ब्राह्मण ने बताया कि बस्सी क्षेत्र का पठान ज़ालिम ज़ाबर ख़ान हिंदुओं पर अत्याचार करता है, हिंदू लड़कियों को उठा ले जाता है और उनकी इज़्ज़त लूटता है। मैं अपनी पत्नी को विदा कराकर (मुकलावा लेकर) लौट रहा था कि रास्ते में पठानों ने मेरी ब्राह्मणी पत्नी को छीन लिया। मैंने बहुत चिल्लाया-पुकारा, लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी। उन्होंने मुझे पकड़कर बुरी तरह पीटा और मेरी पत्नी को लेकर भाग गए। मैंने सरकारी दरबारों में बहुत चक्कर लगाए, नवाबों के सामने हाथ जोड़े, लेकिन किसी ने मेरी सहायता नहीं की। अब मैं आपकी शरण में आया हूँ। मेरी सहायता करें और मेरी पत्नी मुझे वापस दिलवाएँ। गुरु गोबिंद सिंह जी ने साहिबज़ादा अजीत सिंह जी को आदेश दिया कि बस्सी के पठान ज़ाबर ख़ान ने इस ब्राह्मण की पत्नी को अगवा कर लिया है। तुम सिंहों को साथ लेकर जाओ और बिजली की फुर्ती से ब्राह्मणी को छुड़ाकर इस ब्राह्मण के हवाले करो। ज़ाबर ख़ान को उसके अपराध की कठोर सज़ा दो। साहिबज़ादा अजीत सिंह जी ने भाई उदय सिंह और 100 सिंहों को साथ लिया तथा ब्राह्मण को घोड़े पर बैठाया। अभी दिन चढ़ा भी नहीं था कि सिंह बस्सी के पठानों पर टूट पड़े। हवेली का दरवाज़ा तोड़कर भीतर प्रवेश किया। पठानों ने सिखों को आते देखकर “सिंह आ गए, सिख आ गए” का शोर मचा दिया। किसी पठान में इतना साहस नहीं था कि सिखों का सामना कर सके। जान बचाने के लिए उन्होंने तलवारें चलाईं, जिसमें अनेक पठान मारे गए और कुछ सिंह घायल हुए। ज़ाबर ख़ान भीतर के कमरे में छिपा हुआ था। सिखों ने उसे पकड़ लिया। ब्राह्मण ने अपराधी ज़ाबर ख़ान की पहचान कर ली। ब्राह्मणी को भी भीतर से खोजकर सुरक्षित रूप से ब्राह्मण के हवाले कर दिया गया। किसी अन्य वस्तु को हाथ नहीं लगाया गया। इसके बाद साहिबज़ादा अजीत सिंह जी उस स्थान पर पहुँचे जहाँ आज गुरुद्वारा शहीदां लदेवाल (माहिलपुर) स्थित है। घायल सिंहों में से कुछ रात के समय शहीद हो गए। उन सिंहों का अंतिम संस्कार अगले दिन स्वयं साहिबज़ादा अजीत सिंह जी ने अपने हाथों से किया। ज़ाबर ख़ान को बाँधकर घोड़े पर बैठाया गया और ब्राह्मणी सहित सभी आनंदपुर साहिब पहुँचे। गुरु गोबिंद सिंह जी ने ब्राह्मणी को पंडित को सौंपकर उसके घर भेज दिया और कहा— “जिसके लिए सारे दरवाज़े बंद हो जाएँ, उसके लिए गुरु नानक साहिब के दरवाज़े सदैव खुले हैं। जिसकी कोई सहायता न करे, उसके साथ मेरा खालसा हमेशा खड़ा रहेगा।” वाहेगुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी की फतेह।
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