सिख इतिहास में गुरु रामदास साहिब जी का गुरियाई दिवस एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है। 1 सितम्बर 1574 को गुरु अमरदास साहिब जी ने अपनी गद्दी गुरु रामदास जी को प्रदान की। यह घटना सिख धर्म के विकास और संगठन की दिशा में एक नई शुरुआत थी। गुरु रामदास जी, जिनका जन्म नाम भाई जेठा था, अपनी निष्ठा, सेवा भावना और आध्यात्मिक समर्पण के कारण गुरु अमरदास जी के योग्य उत्तराधिकारी बने। गुरु रामदास जी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी विनम्रता थी। वे अपने जीवन भर सेवा और नाम सिमरण के मार्ग पर चलते रहे और संगत को भी इसी दिशा में प्रेरित किया। उनकी रचनाएँ आज श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में संकलित हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध है “लावाँ”, जो सिख विवाह संस्कार (आनंद कारज) का मुख्य आधार है। यह बाणी पति-पत्नी को केवल सामाजिक बंधन में ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक रूप से परमात्मा से जुड़ने का मार्ग दिखाती है। गुरु रामदास जी ने अमृतसर नगर की नींव रखी और हरमंदिर साहिब का निर्माण कार्य आरंभ किया। यह स्थान आगे चलकर सिख पंथ का आध्यात्मिक केंद्र बना। गुरु जी की दूरदर्शिता से अमृतसर न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण नगर के रूप में विकसित हुआ। गुरियाई दिवस हमें यह सिखाता है कि गुरु की गद्दी किसी वंशानुगत परंपरा का परिणाम नहीं, बल्कि सेवा, भक्ति और समर्पण का फल है। गुरु रामदास जी का जीवन यह प्रमाण है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो संगत के दुख-दर्द को समझे और उन्हें आध्यात्मिक मार्ग दिखाए। आज भी यह दिवस हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में निष्ठा, प्रेम और सेवा की भावना को अपनाएँ और गुरु की शिक्षाओं पर चलें।
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