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Nitnama Hindi Ai
5 months ago

जनम दिहाड़ा भाई तारू सिंह जी

भाई तारू सिंह जी (1720–1745) सिख इतिहास के महान शहीदों में से एक हैं, जिन्होंने सिख धर्म और अपने विश्वास के लिए अद्वितीय बलिदान दिया। उनका जन्म अमृतसर ज़िले के गाँव पूहला में भाई जोध सिंह और माता धर्म कौर के घर हुआ। सिख सेवा और मुग़ल अत्याचार 1716 में बाबा बंदा सिंह बहादुर और उनके साथियों की शहादत के बाद मुग़ल शासन ने सिखों पर अत्याचार बढ़ा दिए। सिखों के सिरों पर इनाम रखे गए, और लाहौर के गवर्नर ज़करीया ख़ान ने जुल्म की सारी हदें पार कर दीं। ऐसे कठिन समय में सिख जंगलों में छिपकर रहने लगे। भाई तारू सिंह जी ने अपने परिवार सहित इन सिखों की सेवा शुरू की — खासतौर पर लंगर और अन्य आवश्यक वस्तुओं से उनकी सहायता की। वे गुरबाणी के सिद्धांत “घालि खाइ किछु हथहु देइ” (श्री गुरु ग्रंथ साहिब, पृष्ठ 1245) पर चलते हुए सेवा करते थे। मुखबरी और गिरफ़्तारी जंडियाला गुरु का हरभगत निरंजनिया, जो सिखों का कट्टर विरोधी था, ने ज़करीया ख़ान को भाई तारू सिंह द्वारा सिखों की सहायता की सूचना दी। ज़करीया ख़ान ने तुरंत उन्हें गिरफ़्तार करने का आदेश दिया। गिरफ़्तारी के बाद उन्हें अनेक यातनाएँ दी गईं और इस्लाम कबूल करने या केस कटवाने के लिए मजबूर किया गया। परंतु भाई तारू सिंह ने सिखी सिद्धांत पर अडिग रहते हुए यह सब अस्वीकार कर दिया। शहादत ज़करीया ख़ान ने उनके केस काटने का आदेश दिया, लेकिन भाई तारू सिंह ने कहा — “केस मेरे गुरु की मोहर हैं।” इस पर ज़करीया ख़ान ने जल्लाद को उनकी खोपड़ी उतारने का आदेश दिया। सिख स्रोतों के अनुसार, जब उनकी खोपड़ी उतारी जा रही थी, वे जपुजी साहिब का पाठ कर रहे थे और प्रभु की भक्ति में लीन थे। कहा जाता है कि वे इस भयानक घाव के बाद भी 22 दिन जीवित रहे और 1 जुलाई 1745 को शहीद हुए। इस घटना का प्रभाव यह हुआ कि ज़करीया ख़ान को असहनीय दर्द और पेशाब की समस्या हो गई। सिख स्रोतों के अनुसार, उसने खालसा पंथ से क्षमा माँगी और भाई तारू सिंह जी की जूती से अपने सिर पर मारने से उसे कुछ राहत मिली, परंतु वह 22 दिन बाद मर गया, जैसा कि भाई तारू सिंह ने भविष्यवाणी की थी। शहीदी स्थान भाई तारू सिंह की शहादत लाहौर के नखास चौक (वर्तमान लंडा बाज़ार) में हुई, जहाँ अब गुरुद्वारा शहीद भाई तारू सिंह जी बना हुआ है। यह स्थान आज भी सिख इतिहास की अमर निशानी है। सिख इतिहास में महत्व भाई तारू सिंह जी की शहादत सिखी के सिदक, सेवा और बलिदान की प्रेरणादायक मिसाल है। उनकी याद में हर साल 16 जुलाई को शहीदी दिवस श्रद्धा के साथ मनाया जाता है — विशेष रूप से श्री मंजी साहिब दीवान हॉल, अमृतसर में, जहाँ अखंड पाठ और कीर्तन दरबार आयोजित होते हैं। उनकी शहादत आज भी सिख युवाओं को अपने धर्म, केसों और पहचान की रक्षा की प्रेरणा देती है, जो सिखी की शान और सिदक का प्रतीक हैं।

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