बटाला शहर हर साल संगतों द्वारा संगतां वालों गुरु नानक देव जी और माता सुलखणी जी की शादी को बड़े चाव, उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। हर साल शादी के जश्न की प्रेरणा 100 से भी अधिक पुरानी है। मीरी-पीरी के मालिक, छठे पातशाह श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जब अपने पुत्र बाबा गुरुदित्ता जी की शादी के लिए आए थे तो उन्होंने गुरु नानक साहिब के सहूरा घर के दर्शनों के लिए भी गए थे और जहां गुरु साहिब की शादी हुई थी, वहां से उन्होंने वहाँ एक मंडप बनवाया था। उस समय से ही संगत की एंट्री इस प्रतिष्ठान के दर्शन के लिए बढ़ गई थी। इसके बाद सिख मिसालों के टाईम महाराजा जश्सा सिंह रामगढ़ीआ, रानी सदा कौर के समय भी गुरु साहिब की शादी प्रतिष्ठान की महत्ता संगत में बढ़ गई। महाराज शेर सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान इस स्थान पर खूबसूरत गुरद्वारा श्री देहरा साहिब की उत्साह रखवा दीए और नानक नाम लेने संगता को इस पवित्र स्थान के दर्शनों के लिए आने लगी। सिख मिसालों के दौर से ही गुरद्वारा श्री देहरा साहिब में गुरु साहिब की शादी जश्न मनाया जाता था और उस समय शादी के दिहाड़े पर विशेष कथा कीर्तन होता था। सन् 1917 में शादी का जश्न मनाने के लिए संगतों ने अमृतसर से जंझ बनाकर रेलगाड़ी से बटाला शहर पहुंची। महंत केसरा सिंह और बटाला शहर की संगत ने जंझ का स्वागत गर्मी से किया। जंझ को रेवेले स्टेशन के निकट ही मोहल्ला दारा-उसलाम के बाहरवाल शिवाले में ओटारिया गया और संगत का आओ-भगत किया गया। संगत के ठहरने की व्यवस्था रेलवे स्टेशन के बाहर बना सरां में की गई। इसके बाद महंत केसरा सिंह ने अपने सिर पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब की स्वरूप चुक कर संगत के साथ कीर्तन करते हुए गुरद्वारा श्री देहरा साहिब पहुंचे। उस पूरी रात यहाँ गुरबाणी कीर्तन हो रहा था। अगले दिन सुबह हाथी जी ने अपने सिर पर गुरु ग्रंथ साहिब को छुआ और गुरु ग्रंथ साहिब के चारों ओर प्रकारी छापे पड़ीं। इसके बाद यह प्रथा कई साल तक चली। साल 1952 तक गुरुद्वारा श्री कंध साहिब नहीं हुआ था परंतु संगत ने गुरु साहिब की वर्सोई उस कमंडल को सुजुद का पर्णाम दिया। अमृतसर से आने वाले नगर कीर्तन रेल के बजाए सड़क मार्ग से आने लगा और इसे 'सबद चौंकी' का नाम दिया गया। यह सबद चौंकी हर साल व्याह पुरब अवसर पर बटाला शहर पहुँचती है और संगतें ने इसका हर्षित स्वागत करना और व्याह पुरब की खुशियां मनाना। अब भी यह सबद चौंकी व्याह पुरब वाले दिन पहुँचती है बटाला शहर। व्याह पुरब का आधुनिक रूप लगभग 2 दशक पहले शुरू हुआ। सन् 2000 के करीब बटाला के सरदार बूट हाउस वाले बेड़ी हुरां ने सुल्तानपुर लोधी से बटाला तक पैदल यात्रा करके बरात रूपी नगर कीर्तन लाने की शुरूआत की। इसके बाद सुखमणी सेवा सुसाइटी के प्रधान एडवोकेट रजिंदर सिंह पदम, ज्ञानी हरबंस सिंह और अन्य संगतों के सहयोग से गुरुद्वारा श्री देहरा साहिब द्वारा सन् 2005 में सुल्तानपुर लोधी से बटाला शहर के लिए विशाल बरात रूपी नगर कीर्तन सजाया गया। उसके बाद से लेकर अब तक यह नगर कीर्तन व्याह पुरब से एक दिन पहले शाम को ख्गाला शहर पहुँचता है और रात का विश्राम गुरुद्वारा श्री सति करतारीआं विच होता है। व्याह पुरब वाले दिन सुबह 7 बजे गुरुद्वारा श्री देहरा साहिब से नगर कीर्तन की शुरू होती है जो पूरे दिन बटाला के विभिन्न इलाकों से शाम को गुरुद्वारा श्री कंध साहिब पहुँचता है और अंत में इस नगर कीर्तन का समाप्ति गुरुद्वारा श्री देहरा साहिब में होती है। जब दुल्हन नगर से गुरुद्वारा शेरा साहिब पहुंचती है तो संगत द्वारा इसका बहुत उत्साह से स्वागत किया जाता है। इसके बाद शब्द कीर्तन और लावां का पाठ किया जाता है। बटाला शहर में 'बाबे दे विआह' पर संगतों में हर साल जोश और उत्साह बढ़ रहा है और इस समय एक सबसे बड़े नगर कीर्तन का रूप विकसित हो रहा है। देश-विदेश से संगतें विआह पर्व के मौके पर बटाला शहर स्थित गुरुद्वारा शेरा साहिब और गुरुद्वारा कंध साहिब के नवमस्तक होती हैं और गुरु की आशीर्वाद लेती हैं। - इंदरजीत सिंह हरपुरा, बटाला, पंजाब।
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