गुरद्वारा सुहेेला घोड़ा साहिब, छठे पातशाह श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब जी का ऐतिहासिक स्थान है। काबुल का रहने वाला एक सिख करोड़ी मल था, जो सतिगुरों का अत्यंत श्रद्धालु था। संवत 1635 में इस सिख ने घोड़े सतिगुरों को भेंट रूप में अर्पित किए थे। उन घोड़ों के नाम दिलबाग और गुलबाग रखे गए थे। बाद में सतिगुरों ने घोड़ों के नाम बदलकर जान भाई और सुहेेला घोड़ा रख दिए। माता सुलक्षणी जी को पुत्रों का वर देने के समय सतिगुरु जी सुहेेला घोड़े पर ही सवार थे। गुरु जी ने सुहेेला घोड़े पर ही करतारपुर की लड़ाई लड़ी। युद्ध के दौरान सुहेेला घोड़ा घायल हो गया। करतारपुर की लड़ाई जीतने के बाद सतिगुरु जी कीरतपुर साहिब जा रहे थे। रास्ते में घोड़े ने शरीर त्याग दिया। संस्कार करते समय घोड़े के शरीर में से सवा मन (लगभग 20 किलो) कच्चा सिक्का निकला। श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब जी ने अपने सिखों को साथ लेकर अरदास करके स्वंय अपने हाथों से सुहेेला घोड़े का संस्कार किया, और यह स्थान सुहेेला घोड़ा साहिब के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
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